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पशुपति पारस और चिराग की लड़ाई से किसकी परेशानी बढ़ेगी ?

पशुपति पारस ने कहा, नहीं छोड़ेंगे हाजीपुर सीट

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बिहार की हाजीपुर लोकसभा सीट अब विरासत की लड़ाई का केंद्र बनता नज़र आ रहा है. राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के नेता पशुपति पारस ने साफ-साफ कह दिया है कि 2024 में वो हाजीपुर की सीट नहीं छोड़ेंगे. रामविलास पासवान के छोटे भाई और हाजीपुर से सांसद पशुपति पारस ने कहा कि वो आगली बार भी हाजीपुर से ही चुनाव लड़ेंगे. इसमें कोई दुविधा नहीं है परन्तु कुछ लोग एनडीए का नाम लेकर भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं.

 

पशुपति पारस के ऐलान के बाद क्या करेंगे चिराग पासवान ?

 

पशुपति पारस का इशारा मुख्य रुप से भतीजे चिराग पासवान की तरफ था. गौरतलब है कि चिराग पासवान पहले ही हाजीपुर सीट से अपनी मां रीना पासवान को चुनावी मैदान में उतारने का ऐलान कर चुके हैं. ऐसे में अब चिराग पासवान का क्या स्टैंड रहेगा इसपर सबकी नजरें टिकी हैं. यदि दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहे तो मुकाबले में देवर-भाभी आमने-सामने होंगे. ऐसे में मुकाबला काफी रोचक होगा.  परन्तु इसके साथ ही यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि इससे परेशानी किसकी बढ़ेगी और फायदा किसे होगा ? राजनीति के कई जानकारों का मानना है कि यदि दोनों पक्ष अपने-अपने स्टैंड पर अड़े रहते हैं तो परेशानी एनडीए में भी बढ़ सकती है और इसका फायदा विपक्ष को मिल सकता है.

 

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पशुपति पारस ने इशारों में कई नेताओं पर साधा निशाना

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पटना में पशुपति पारस ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि मौजूदा लोकसभा में उनकी पार्टी के पांच सांसद है. हम सभी पांच सीटों पर चुनाव लड़ेंगे और एनडीए को सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने में मदद करेंगे. उन्होने कार्यकर्ताओं को सदस्यता अभियान तेज करने और चुनाव के लिए तैयार रहने के लिए कहा. ये पूछे जाने पर कि लोकसभा चुनाव में वो कितनी सीटें चाहते हैं, पशुपति पारस ने खुलकर जवाब नहीं दिया. उन्होनें कहा कि पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान एनडीए में तीन दल शामिल थे. उस वक्त एनडीए को 39 सीटों पर जीत मिली थी. उनकी पार्टी बीजेपी की सबसे स्थिर सहयोगी है. इसके आगे पारस ने कहा कि ऐसे कई लोग हैं जिनपर भरोसा नहीं किया जा सकता है. पशुपति जब ये बात कह रहे थे तो माना जा रहा है कि उनका इशारा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के नेता जीतन राम मांझी और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक जनता दल के नेता उपेंद्र कुशवाहा की ओर था.

 

साल 2019 में बिहार में एनडीए में तीन दल शामिल थे और तब 39 सीटें जीतीं थीं. अब इसमें केवल दो दल हैं. हम बीजेपी के एकमात्र स्थिर सहयोगी हैं. ऐसे कई लोग हैं जिन पर भरोसा नहीं किया जा सकता.

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