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जगत कल्याण के लिए गरल पान करने वाले शिव

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यूं तो हिंदू धर्म में अनेकों देवी देवता हैं और उनकी उपासना से मनोवांछित फल पाए जा सकते हैं, किंतु भगवान शिव की समानता कोई अन्य देवी देवता नहीं कर सकता, क्योंकि भगवान शिव अपने भक्तों के लिए हलाहल तक का पान कर लेते हैं। इसीलिए तो भगवान शिव की आराधना स्वयं नारायण भी करते हैं। भोलेनाथ की उपासना भी बहुत सरल है। बहुत ही आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं भोले शंकर, उन्हें तो शिवलिंग पर एक लोटा जल और बिल्वपत्र चढ़ा कर ही प्रसन्न किया जा सकता है। भगवान को तो जगत की किसी वस्तु की अपेक्षा ही नहीं है, संसार की सारी वस्तुएं तो ईश्वर द्वारा ही प्रदत्त हैं, किंतु यह संसार कर्म प्रधान है इसलिए कोई भी व्यक्ति जब किसी भी प्रकार के कर्म के माध्यम से ईश्वर से जुड़ता है तभी उसे शुभ फलों की प्राप्ति हो सकती है, चाहे वह कर्मकांडी पूजा हो अर्थात रुद्राभिषेक हो या मंत्र और स्त्रोतों के द्वारा की गई मानसिक आराधना। दीन-दुखियों की सेवा करके भी प्रभु को प्रसन्न किया जा सकता है और मेरा मानना है कि ईश्वर को प्रसन्न करने का सबसे सर्वश्रेष्ठ साधन यही है कि दीन-दुखियों के हृदय में बैठे हुए भगवान की सेवा की जाए तो कोई और उपासना करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। भगवान शिव जगत के कल्याण के लिए ही अपनी जटाओं में गंगा को समेटे हैं, ताकि प्रबल वेगवती गंगा मर्यादित होकर धरती पर उतरें और संसार का कल्याण करें। दुष्टों का नाश करने के लिए और भक्तों को अभय प्रदान करने के लिए ही भगवान शिव त्रिशूल धारण करते हैं। अपने कंठ में भोले शंकर जहरीले नाग को लपेटे रहते हैं। इसका तात्पर्य है कि शिवजी केवल सद्गुणी लोगों के ही आश्रयदाता नहीं हैं बल्कि वे अवगुणी लोगों को भी आश्रय देते हैं, तभी तो देवताओं और मनुष्यों के साथ-साथ असुर जाति के लोग भी उनके भक्त होते हैं। श्मशान वासी शिव संसार की आसक्ति से उदासीन अपने तन पर भस्म लपेटे रहते हैं। भगवान शिव का तीसरा नेत्र प्रलय के समय संपूर्ण सृष्टि को जलाकर भस्म कर देता है, ताकि पुन: एक नवीन सृष्टि का निर्माण हो सके। संसार के भोगों से विरक्त शिव अपने भक्तों को संसार के समस्त भोग प्रदान करते हैं। डमरू धारी शिव जितनी जल्दी प्रसन्न होते हैं उतनी ही शीघ्र क्रोधित भी हो जाते हैं, किंतु भगवान शिव का कोप भाजक बनकर भी जीवों का कल्याण ही होता है, तभी तो कामदेव को जलाकर भस्म कर देने पर उनकी पत्नी रति को यह वरदान मिला कि कामदेव भगवान श्री कृष्ण के पुत्र बनकर द्वापर युग में उत्पन्न होंगे, जहां एक ओर कामदेव को सजा मिली भगवान शिव की तपस्या भंग करने की, वहीं दूसरी ओर उन्हें सौभाग्य प्राप्त हुआ भगवान श्री कृष्ण का पुत्र बनने का, यह भगवान शिव की कृपा ही तो थी। समस्त योगों के प्रदाता भगवान शिव अधिकांशत: समाधि में ही लीन रहते हैं, भगवान शिव की समाधि से उत्पन्न ऊर्जा ही इस जगत की ऊर्जा का स्रोत है। परम कृपालु और दयालु शिव, श्वसुर द्वारा शापित और क्षयरोग से पीड़ित चंद्रमा को भी अपने मस्तक पर धारण कर उन्हें सम्मान प्रदान करते हैं और चंद्रशेखर कहलाते हैं। शिव की अर्धांगिनी हैं शक्ति, वो शक्ति जो प्रकृति स्वरूपा भी हैं और संपूर्ण सृष्टि का आधार भी। शिव ही शक्ति हैं और शक्ति ही शिव हैं, तभी तो भगवान शिव को अर्धनारीश्वर कहा जाता है उनके आधे अंग में शिव स्वरूप पुरुष और आधे अंग में गौरी स्वरूपा नारी की कल्पना की जाती है। बिना शक्ति के शिव शव हैं अर्थात शिवा ही उनकी आत्मा हैं। अपने भक्तों के लिए वे गौरी और शंकर का अलग-अलग रूप बन जाते हैं और शिव-शक्ति का मिलन ही शिवरात्रि है। शक्ति स्वरूपा गौरी कठोर तपस्या कर शिव को प्राप्त कर लेती हैं, पर वास्तव में शिव तो उनको प्राप्त ही थे, वे तो केवल संसार के लिए शिव को पाने का मार्ग प्रशस्त करती हैं, जिस प्रकार समस्त ज्ञानों से परिपूर्ण होते हुए भी उमा अज्ञानियों की भांति भगवान शिव से अनेकों प्रश्न करती हुई दिखती हैं, क्योंकि वे ज्ञान और विज्ञान को संसार के समक्ष लाना चाहती हैं। शक्ति स्वरूपा गौरी का हृदय संसार के प्रति अत्यंत करुणा से भरा हुआ है क्योंकि वह मां हैं जगत की। संसार के जितने भी मंत्र, स्तोत्र, कवच या अन्य आध्यात्मिक ज्ञान हैं वे सभी शिव और पार्वती के संवाद से ही जगत को प्राप्त हुए हैं। भगवान शिव करोड़ों-करोड़ों वर्षों तक तपस्या में लीन रहते हैं और जब वे अपनी समाधि से बाहर आते हैं, तो अपनी अर्धांगिनी गौरी के साथ ज्ञान पूर्ण चर्चा कर जगत को लाभान्वित करते हैं, इस प्रकार शिव और शिवा सदैव जगत का कल्याण ही करते रहते हैं।भगवान शिव का भोलापन कभी-कभी देवताओं के लिए संकट का कारण भी बन जाता है, क्योंकि असुर उनके इसी भोलेपन का फायदा उठाकर मनमाना वरदान प्राप्त कर लेते हैं और फिर संपूर्ण सृष्टि के लिए एक विकट समस्या बन जाते हैं, भस्मासुर को ही देख लें, वह शिव से वरदान प्राप्त करके शिव को ही भस्म करने चला था, किंतु नारायण ने अपना मोहिनी रूप धारण कर उसे ऐसा मोहित किया कि वह अपने सर पर ही हाथ रख कर भस्म हो गया। ऐसी विकट समस्याएं उत्पन्न होने के बाद भी भगवान शिव ने अपना भोलापन नहीं त्यागा और उसके बाद भी असुर उन्हें प्रसन्न कर उनसे मनमाना वरदान प्राप्त करते रहे। भगवान शिव के इस विशिष्ट गुण के कारण ही केवल सुर ही नहीं असुर भी उनके परम भक्त हैं। किंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि व्यक्ति के कर्म उसे उसके फल तक पहुंचा ही देते हैं, उसे ईश्वर भी नहीं रोक सकते या कह सकते हैं कि ईश्वर ने ऐसी व्यवस्था ही कर रखी है कि वह प्रत्यक्ष में तो विवश होकर वरदान दे देते हैं किंतु दुष्कर्म करने वाले को किसी न किसी प्रकार उसका दंड अवश्य देते हैं और उसे नष्ट कर ही देते हैं। श्रीमद्भागवत में कई जगह पर ऐसा आया है जब भगवान कृष्ण ने भगवान शिव को अपनी आत्मा बताया है, अत: दंड चाहे नारायण या नारायण के अवतारों के रूप में दिया गया हो, शिव और नारायण तो एक ही हैं। बिना शिव के हरि नहीं प्राप्त हो सकते क्योंकि शिव ही जगद्गुरु हैं और हरि को प्राप्त करने के सारे मार्ग उन्होंने ही बतलाए हैं और बिना हरि को प्राप्त किए केवल शिव को प्राप्त कर लेने पर भी मनुष्य की आध्यात्मिक यात्रा पूरी नहीं होती। अत: हमें हरि और हर दोनों को अपने हृदय में धारण कर अपनी आध्यात्मिक यात्रा पर चलना चाहिए।

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